उत्तराखंड:
संवाददाता – ईश्वर सिंह
खटीमा। शिक्षक एवं साहित्यकार *रावेंद्र कुमार ‘रवि’* के संयोजन में स्थानीय *तारा बाल संस्था* में एक रसमय कवि सभा का आयोजन संस्थाध्यक्ष *कुमार विमलेश* द्वारा किया गया। सभा के *मुख्य अतिथि* खटीमा के विकासखंड शिक्षाधिकारी *भानु प्रताप कुशवाहा* एवं अन्य कवियों द्वारा विधिवत सरस्वती-पूजन और *राम रतन यादव* द्वारा सरस्वती-वंदना से किया गया। मंगल तिलक लगाकर सभी अतिथियों का स्वागत अग्रवाल इंटर कॉलेज की कक्षा 11 की छात्रा आलिया ने किया।
इस कवि सभा का उद्देश्य विभिन्न रसों से परिपूर्ण काव्य-प्रस्तुतियों के माध्यम से मानवीय भावनाओं की व्यापक अभिव्यक्ति को मंच प्रदान करना, साहित्य के प्रति रुचि जागृत करना तथा सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को सुदृढ़ करना था।
मुख्य अतिथि *भानु प्रताप कुशवाहा* की कविता कुछ इस प्रकार कही गई –
गरमाहट बहुत है मौसम में
ओ ठंडी बयार
मेरे आँगन से भी बह जा तू!
सावन के मीठे-मीठे झूलों
एक गुरुमई थपकी दे जा तू
ओ मेरी सखी, ओ मेरे सखा
मेरे कंठ ने जो बुने हैं गीत
इस नीम की डाल पे
मेरे संग-संग
वीणा की धुन पर गाले तू
बड़े मधुर हैं अधर तेरे
उमंग-उमंग में उंगली चलती तारों पर
अपनी तानों मेरे गीत सजा जा तू!
राम रतन ने वंदना के अतिरिक्त एक आत्मगीत भी सुनाया –
शब्द मिल जाएँ सही से,
तो बने कुछ गीत प्यारा।
और सुर की साधना का,
गीत पा जाए सहारा।।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद, उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष कवि सभा के विशिष्ट अतिथि *डॉ जगदीश पंत कुमुद* रहे। उन्होंने सुनाया –
नब्ज पकड़ ली,
उन्हें जो हाथ थमाया।
फिर जा के मेरा हाल,
सब ग़ैरों को बताया।
सेंट जेवियर स्कूल की छात्रा भानु प्रताप कुशवाहा की नन्ही बिटिया *रोशिता* ने वीडियो कॉल के द्वारा अपनी कविता सुनाई।
कक्षा 5 राजकीय प्राथमिक पाठशाला कर बेटा की कक्षा 5 में पढ़ने वाली नन्ही कवयित्री *सानिया* ने स्वरचित कविता सुनाकर सबका मन मोह लिया –
हरियाली में फूल खिले,
मधुर खुशबू आई।
सूँघ-सूँघकर मन भर जाए,
तितली कहती आई।
नन्ही साँची ने भी रावेंद्र कुमार ‘रवि’ का एक गीत सुनाया –
कभी न हों
जो हमसे गुस्सा
हरदम हँसें हँसाएँ।
ऐसी दीदी ही विद्यालय
हमें पढ़ने आएँ।
*नूरेनिशाँ* की कविता में उनके मन की चाहत कुछ इस तरह झलकी –
दिल की बगिया में सजाया है तुम्हें,
बचपन में यह ख्याल आया था हमें।
नन्हा-सा बीज बोया था कभी हमने,
आज तुझे पाने की ख्वाहिश में।
*तुलसी बिष्ट ‘तनु’* ने अपना गीत कुछ इस तरह गुनगुनाया –
क्या थी देखिए
क्या से क्या हो गयी मैं।
बदरी न बरसी
हवा हो गयी मैं।
कहना था तुमसे बहुत कुछ मगर,
कह न पायी लेकिन
बयाँ हो गयी मैं।
*हेमा जोशी ‘परु’* के गीत ने सबका मन बाँध लिया –
टूटे दिल की बस्ती को
यूँ भी बसाना ठीक नहीं।
राख हुए अरमानों को
फिर से सजाना ठीक नहीं।
ज़ख़्म अभी ताज़ा हैं दिल के,
दर्द पुराना जागेगा,
सूखे पत्तों पर यादों का दीप जलाना ठीक नहीं।
पीलीभीत से पधारे कवि *सत्यपाल सिंह ‘सजग’* ने यह गीत गाया –
*दिल के अखबारों को पढ़कर,
प्रीति नहीं सिख पाए*
*हम गीत नहीं लिख पाए।





