निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों के नाम पर राजनीतिक और संस्थागत प्रचार? व्यवस्थाओं पर भी उठ रहे सवाल। संवाददाता उमाकांत विश्वकर्मा 

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निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों के नाम पर राजनीतिक और संस्थागत प्रचार? व्यवस्थाओं पर भी उठ रहे सवाल।

संवाददाता उमाकांत विश्वकर्मा

बलिया आजकल रसड़ा क्षेत्र सहित आसपास के इलाकों में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों के आयोजन का चलन तेजी से बढ़ रहा है। जनहित से जुड़े इन आयोजनों का उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना बताया जाता है, लेकिन अब इन शिविरों को लेकर राजनीतिक और संस्थागत प्रचार के आरोपों के साथ-साथ व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठने लगे हैं।

आरोप है कि कई स्वास्थ्य शिविरों में मरीजों की जांच और उपचार के साथ-साथ आयोजकों, राजनीतिक नेताओं और संस्थाओं के नाम, फोटो तथा प्रचार सामग्री को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन शिविरों का उद्देश्य वास्तव में जनसेवा है या फिर स्वास्थ्य सेवा के माध्यम से राजनीतिक और संस्थागत ब्रांडिंग की जा रही है?

वहीं, कई शिविरों में मरीजों के लिए समुचित बैठने की व्यवस्था तक नहीं होती। लोग लंबी कतारों में इधर-उधर खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते नजर आते हैं। कई बार भीड़ के बीच धक्का-मुक्की जैसी स्थिति भी बन जाती है। ऐसे में बुजुर्गों, महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

लोगों का कहना है कि निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा निश्चित रूप से सराहनीय पहल है, लेकिन यदि इसे वास्तव में सेवा भाव से आयोजित किया जा रहा है तो मरीजों के लिए बैठने, पेयजल, पंजीकरण, जांच और चिकित्सकीय परामर्श की बेहतर व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

सवाल यह है कि क्या निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर वास्तव में सेवा भाव का माध्यम हैं या फिर राजनीतिक और संस्थागत प्रचार का नया तरीका बनते जा रहे हैं? जनता अब इस पूरे मुद्दे को समझ रही है और आयोजनों में होने वाले प्रचार के साथ-साथ मरीजों को मिलने वाली वास्तविक सुविधाओं पर भी नजर रख रही है।

अब देखना यह है कि भविष्य में आयोजित होने वाले निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों में जनसेवा को प्राथमिकता दी जाती है या प्रचार-प्रसार को।

आपकी राय क्या है—निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों में राजनीतिक और संस्थागत प्रचार उचित है या नहीं?