PRATAPGARH
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ATUL YADAV
जिले में कैटल कैचर का शानदार शोपीस और सड़कों पर VIP बेसहारा गोवंशों का जलवा
*सदर ब्लाक सहित अन्य ब्लाकों में कैटल कैचर केवल ‘कैमरा’ कैचर बन कर रह गए जिम्मेदार लाखों का बंदरबांट कर AC रूम में कर रहे आराम,*
*जिले की सदर ब्लाक में लाखों रुपये खर्च करके चमचमाते हुए कैटल कैचर खरीदे थे, तो लगा था कि अब क्षेत्र में सड़कों पर ‘काउ-बॉय’ युग की शुरुआत होने वाली है। जनता ने राहत की सांस ली थी कि चलो, अब सड़कों पर सांडों से ‘दंगल’ नहीं लड़ना पड़ेगा। लेकिन अफ़सोस, ये लाखों की गाड़ियां अब सरकारी विभागों की शोभा बढ़ाने वाले किसी कीमती शो-पीस से कम साबित नहीं हो रहीं। विकास भवन से लेकर कटरा मेदनीगंज तक वहीं भूपियामऊ से प्रतापगढ़ की जाने वाली मुख्य सड़क और चौराहों पर गौवंश ने ऐसा कब्ज़ा जमाया है, जैसे उन्होंने अपनी नागरिकता यहीं की रजिस्टर्ड करवा ली हो। बीच सड़क पर बैठे सांडों का आत्मविश्वास देखने लायक होता है। मजाल है कि कोई हॉर्न बजाकर उन्हें हिला दे! वे सड़क के बीचो-बीच अंगद की तरह पैर (और पूरा शरीर) जमाकर बैठते हैं और आने-जाने वाले दुपहिया वाहनों को इस तरह देखते हैं, मानो पूछ रहे हों—”का हो भाई, कत्ता जल्दी में अहा?”*
*बता दें कि प्रत्येक ब्लॉक में क्षेत्र पंचायत निधि से लगभग 7 से 10 लाख रुपये के बजट से आए इन कैटल कैचरों का मुख्य काम था गौवंशों को पकड़कर सुरक्षित गौशालाओं तक पहुंचाना। लेकिन हकीकत यह है कि ये गाड़ियां तब तक ही सड़कों पर दौड़ती दिखती हैं, जब तक किसी बड़े अधिकारी का दौरा न हो या फिर किसी अखबार के लिए फ़ोटो खिंचवानी हो। फ़ोटो खिंचने के बाद, कैटल कैचर आराम फरमाते हैं और गौवंश फिर से सड़कों पर अपनी ‘शहंशाहियत’ शुरू कर देते हैं। जनता अब इसे ‘कैटल कैचर’ नहीं, बल्कि ‘कैमरा कैचर’ कहने लगी है।हम कह सकते है कि जिम्मेदारी की ‘पास द पार्सल’ रेस है। सड़कों पर घूमते इन बेसहारा पशुओं की जिम्मेदारी किसकी है? अगर आप नगर पालिका से पूछेंगे, तो वे ग्रामीण विकास की तरफ़ उंगली उठा देंगे।* *ग्रामीण विकास वालों से बात करेंगे, तो वे पशुपालन विभाग का रास्ता दिखा देंगे। अन्य संबंधित विभाग वाले कहेंगे कि बजट तो फलां जगह अटका है। कुल मिलाकर, जिम्मेदारी का ऐसा ‘पास द पार्सल’ खेल चलता है कि असली जवाबदेही कहीं बीच चौराहे पर ही दम तोड़ देती है। लाखों के बजट और कागजी दावों के बीच, आवारा पशु आज भी प्रतापगढ़ की ट्रैफिक व्यवस्था
के असली ‘डायलॉग राइटर’ बने हुए हैं। अब देखना यह होगा कि जिले के जिम्मेदार बड़े अफसरों की कुम्भकर्णीय नींद टूटेगी या फिर वातानुकूलित कक्ष में करवटें बदल बदल कर समय समय पर पैसे का बंदरबांट करते रहेंगे।
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