ईरान से आयतुल्लाह सैयद मुजतबा खामेनेई का पहला बयान

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संवाद दाता:- शमीम हसन 

ईरान से आयतुल्लाह सैयद मुजतबा खामेनेई का पहला बयान मैं, सैयद मुज्तबा हुसैनी खामेनेई, आपका ख़ादिम, इस्लामिक रिपब्लिक ब्रॉडकास्टिंग के ज़रिए असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के फ़ैसले से वाक़िफ़ हुआ। मेरे लिए उस मक़ाम पर बैठना बहुत भारी ज़िम्मेदारी है जहाँ इससे पहले दो बड़े रहनुमा इमाम रुहोल्लाह खुमैनी और शहीद अली खामेनेई बैठ चुके हैं।

मुझे उनकी शहादत के बाद उनके जिस्म-ए-मुबारक को देखने का मौक़ा मिला था। जो मैंने देखा वह सब्र और इस्तिक़ामत का एक पहाड़ था। बताया गया कि उन्होंने अपने सही सलामत हाथ की मुट्ठी भींच रखी थी।

हालिया वाक़ियात में ईरान की क़ौम ने जो बसीरत, हिम्मत और सब्र दिखाया उसने दोस्तों को हैरत में डाल दिया और दुश्मनों को भी चौंका दिया। दरअसल आप लोगों की मौजूदगी और हिम्मत ही थी जिसने मुल्क की ताक़त और इख़्तियार को बरक़रार रखा।

अगर हमसे एक बड़ी नेमत छिन भी गई, तो उसकी जगह ईरानी क़ौम की वही अम्मार जैसी मौजूदगी इस निज़ाम को फिर हासिल हो गई।

मेरे जांबाज़ भाइयों! अवाम की ख्वाहिश है कि ऐसी मज़बूत और असरदार दिफ़ा जारी रहे जिससे दुश्मन को पछतावा हो। इसके साथ ही हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने का जो दबाव का ज़रिया है, उसका इस्तेमाल भी जारी रहना चाहिए।

ऐसे इलाक़ों में नए मोर्चे खोलने की तैयारी भी की गई है जहाँ दुश्मन का तजुर्बा बहुत कम है और वह बेहद कमज़ोर साबित हो सकता है। अगर जंग की सूरत जारी रहती है तो मफ़ाद को देखते हुए इन मोर्चों को भी खोल दिया जाएगा।

मैं मुक़ावमत के मोर्चे के तमाम लड़ाकों का दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। हम मुक़ावमत के मुल्कों को अपने सबसे अच्छे दोस्त समझते हैं और मुक़ावमत इस्लामी इंक़लाब की बुनियादी क़ीमतों का अहम हिस्सा है।

यमन के बहादुर लोगों ने ग़ज़ा के मज़लूमों का साथ देना बंद नहीं किया। हिज़्बुल्लाह ने तमाम मुश्किलों के बावजूद इस्लामी जम्हूरिया की मदद की और इराक़ी मुक़ावमत ने भी इसी रास्ते पर डटकर क़दम बढ़ाए।

मैं सबको यक़ीन दिलाता हूँ कि हम अपने शहीदों के ख़ून का इंतक़ाम लेना नहीं छोड़ेंगे। यह इंतक़ाम सिर्फ़ एक बड़े रहनुमा की शहादत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुश्मन के हाथों शहीद होने वाला हर शख़्स इस इंतक़ाम की फ़ाइल में शामिल है।

अब तक इस ख़ून का बदला सिर्फ़ थोड़ी हद तक लिया गया है, लेकिन जब तक यह पूरा नहीं हो जाता, यह मामला बाकी सब से ऊपर रहेगा। दुश्मन ने जो जुर्म मीनाब तैय्यिबा ट्री स्कूल और कुछ दूसरी जगहों पर किए हैं, उन्हें इस हिसाब में ख़ास अहमियत दी जाएगी।

हम दुश्मन से जंग का हरजाना वसूल करेंगे। अगर वह इसे देने से इंकार करेगा तो हम उसकी जितनी जायदाद मुनासिब समझेंगे उसे ज़ब्त कर लेंगे, और अगर यह भी मुमकिन न हुआ तो उतनी ही क़ीमत की उसकी जायदाद तबाह कर देंगे।

पिछले सालों में दुश्मन ने कुछ पड़ोसी मुल्कों में अपने फौजी अड्डे बना लिए हैं। हालिया हमले में उन्हीं अड्डों का इस्तेमाल किया गया, इसलिए हमने उन पर हमला किया ठीक वैसे ही जैसे पहले साफ़ चेतावनी दी थी और उन मुल्कों की सरज़मीन पर कोई तजावुज़ नहीं किया, सिर्फ़ उन्हीं फौजी ठिकानों को निशाना बनाया।

इलाक़े के मुल्कों को चाहिए कि हमारे वतन पर हमला करने वालों और हमारे लोगों के क़ातिलों के बारे में अपना मौक़िफ़ साफ़ करें। मैं उन्हें मशवरा देता हूँ कि इन फौजी अड्डों को जल्द बंद कर दें, क्योंकि अब तक उन्हें समझ आ जाना चाहिए कि अमरीका का अमन और सिक्योरिटी का दावा महज़ एक झूठ है।

मैं फिर दोहराता हूँ कि इस्लामी जम्हूरिया इलाक़े में दबदबा या क़ब्ज़ा क़ायम करना नहीं चाहता, बल्कि अपने तमाम पड़ोसियों के साथ इत्तेहाद और अच्छे, गर्मजोशी भरे ताल्लुक़ात चाहता है।

मैदान में असरदार मौजूदगी क़ायम रहनी चाहिए जैसे आपने जंग के इन दिनों और रातों में दिखाई या किसी और असरदार किरदार की शक्ल में। मैं 1447 हिजरी के क़ुद्स डे के मौक़े पर बड़ी तादाद में शिरकत की अहमियत याद दिलाता हूँ, जहाँ दुश्मन को करारा जवाब देने का जज़्बा भी सामने आना चाहिए।

हम आपसे वादा करते हैं कि अपनी पूरी ताक़त के साथ इस झंडे को बुलंद रखने की कोशिश करेंगे, जो हक़ के मोर्चे का असली परचम है, और आपके मुक़द्दस मक़ासिद को हासिल करने के लिए पूरी जद्दोजहद करते रहेंगे।