अधिकारी के आने से पहले हटती हैं दुकानें, जाते ही फिर सज जाता है बाजार! रसड़ा रेलवे स्टेशन के बाहर कथित अवैध मांस-मुर्गे की दुकानों पर गंभीर सवाल, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर उठी उंगली। संवाददाता उमाकांत विश्वकर्मा

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📰 अधिकारी के आने से पहले हटती हैं दुकानें, जाते ही फिर सज जाता है बाजार!

रसड़ा रेलवे स्टेशन के बाहर कथित अवैध मांस-मुर्गे की दुकानों पर गंभीर सवाल, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर उठी उंगली।

संवाददाता उमाकांत विश्वकर्मा

(बलिया) रसड़ा रेलवे स्टेशन के बाहर कथित रूप से संचालित मांस-मुर्गे की दुकानों और अन्य दुकानों को लेकर रेलवे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जैसे ही पूर्वोत्तर रेलवे, वाराणसी मंडल के मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) आशीष जैन के निरीक्षण की सूचना मिली, स्टेशन के बाहर संचालित बताई जा रही दुकानों को आनन-फानन में हटा दिया गया। लेकिन अधिकारियों के जाते ही कथित तौर पर वही दुकानें दोबारा सजने लगीं।

अधिकारी आए तो अतिक्रमण गायब, जाते ही फिर शुरू हुआ खेल!

स्थानीय लोगों का कहना है कि डीआरएम के निरीक्षण से पहले स्टेशन के बाहर का नजारा बदल गया। जिन स्थानों पर कथित रूप से मांस-मुर्गे की दुकानें और अन्य दुकानें संचालित होती थीं, वहां अचानक सफाई दिखाई देने लगी। लेकिन आरोप है कि अधिकारी के जाते ही दुकानदारों ने फिर से अपना सामान सजाना शुरू कर दिया।

मौके पर रखे पिंजरे, दुकान का सामान और अन्य अवशेष इस पूरे मामले को लेकर कई सवाल खड़े कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का सीधा सवाल है कि यदि ये दुकानें अवैध हैं तो अधिकारियों के जाने के बाद दोबारा कैसे लग जाती हैं?

क्या कार्रवाई सिर्फ निरीक्षण तक सीमित है?

व्यापार कल्याण समिति के संरक्षक सुरेश चंद्र जायसवाल और भाजपा नेता प्रवीण कुमार सिंह ने कहा कि यदि रेलवे की भूमि अथवा स्टेशन परिसर के आसपास बिना अनुमति दुकानें संचालित हो रही हैं तो रेलवे प्रशासन को इसकी निष्पक्ष जांच कर स्थायी कार्रवाई करनी चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि अधिकारी के आने से पहले ही अतिक्रमण क्यों हटाया गया और उनके जाते ही दुकानें फिर क्यों सजने लगीं? क्या रेलवे प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है या फिर जानबूझकर आंखें बंद की जा रही हैं?

कथित संरक्षण के बिना इतना बड़ा खेल संभव है?

स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि स्टेशन के आसपास कथित रूप से संचालित दुकानों को किसी प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त हो सकता है। लोगों का कहना है कि यदि प्रशासनिक कार्रवाई का भय होता तो अधिकारी के जाते ही दुकानें दोबारा लगाने की हिम्मत कोई नहीं करता।

हालांकि, किसी प्रभावशाली व्यक्ति की संलिप्तता या किसी अधिकारी की मिलीभगत के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। फिर भी जिस तरह अधिकारियों की मौजूदगी में दुकानें हटती हैं और उनके जाते ही फिर से सजने लगती हैं, उससे रेलवे प्रशासन की कार्रवाई और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

शिव मंदिर के आसपास मांस की दुकानों को लेकर भी नाराजगी

रसड़ा रेलवे स्टेशन के बाहर स्थित प्राचीन भगवान शिव मंदिर के आसपास कथित रूप से मांस-मुर्गे की दुकानें संचालित होने को लेकर भी स्थानीय लोगों में नाराजगी है। लोगों का कहना है कि मंदिर के दोनों ओर लगभग 100 से 200 मीटर की दूरी पर ऐसी दुकानें संचालित होने से धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं।

स्थानीय लोगों ने रेलवे प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि स्टेशन परिसर और आसपास की भूमि की निष्पक्ष जांच कराई जाए, अवैध अतिक्रमण की पहचान की जाए और यदि दुकानें बिना अनुमति संचालित पाई जाती हैं तो स्थायी कार्रवाई की जाए।

सबसे बड़ा सवाल: आखिर किसकी अनुमति से लगती हैं दुकानें?

अब सवाल यह है कि—

क्या रेलवे प्रशासन के अधिकारियों को इन दुकानों की जानकारी नहीं है?

यदि जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं?

अधिकारी के आने से पहले दुकानें हटती और जाते ही फिर लगती क्यों हैं?

क्या किसी की शह या संरक्षण के बिना यह पूरा खेल संभव है?

इन सवालों का जवाब अब रेलवे प्रशासन की जांच और कार्रवाई से ही सामने आएगा। स्थानीय लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निरीक्षण के बाद रेलवे प्रशासन कथित अतिक्रमण के खिलाफ कोई ठोस और स्थायी कार्रवाई करता है या फिर कुछ दिनों बाद स्टेशन के बाहर फिर वही पुराना नजारा दिखाई देगा।